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Tuesday, 30 April 2024

क्या तुम

 क्या तुम कभी मेरी 

सुबह का हिस्सा बन पाओगे 


जल्दी- जल्दी तैयार होते 

मेरे अदना सवाल सुन पाओगे 


वो चाय की चुस्कियों के बीच की खामोशियाँ 

उनमें छिपी हज़ार बातों में अपनी आवाज़ मिलाओगे 


 क्या तुम कभी मेरी 

सुबह का हिस्सा बन पाओगे ?


चलो, सुबह तो व्यस्त होती हैं 

शामों के बारे में सोचना 


थक कर लौटते हो जब 

घर के बारे में सोचना 


घर की सारी बातें बेमानी नहीं होती 

सच है, ये बातें रूमानी नहीं होती 

फिर भी होती हैं  जिन्दगी का अहम् हिस्सा


क्या कभी तुम मेरी घरेलु बातें सुन पाओगे ?


क्या कभी तुम मेरी जिन्दगी का हिस्सा बन पाओगे ?


क्या कभी?




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Friday, 9 December 2022

परदेसी नदी

 इस अनजान शहर में 

ये नदी ही है साथ मेरे 

दूर देश से आती है 

दूर देश को जाती है 

इस शहर से गुजरती हुई

मुझको कुछ सुकून दे जाती है 


परदेस में परदेसी नदी 

मुझको अपनी सी लगती है 

शायद क्योंकि मेरी तरह ही 

ये कहीं नहीं ठहरती है


इसकी लहरों जैसे ही 

रहता मेरा मन भी बेकल 

सबको लगती ये अपनों सी

इसे मिलता नहीं अपनापन 


यात्रा हम दोनों की है  एक-सी 

लगता है जैसे - 

बेफिक्र से बहते हम दोनों समय के संग 


बस अंतर इतना ही है 

भूत, वर्तमान और भविष्य में 

यह एक साथ है रह पाती 

और मैं इस त्रिकोण का 

 गणित  नहीं समझ  पाती l



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Monday, 26 September 2022

अनचाही बेटी

 हाँ माना 

बेटी हूँ अनचाही 

पर हूँ तो तुम्हारी 

तुम्हारे ही गर्भ से जन्म लिया 


हाँ माना 

कर्णधार था कोई विदेशी

रचा जिसने मुझे तलवार सा 

काटने को बांटने को 

उस भारत को 

जो विश्व अपार था 


" कैसे इस संस्कृति को नष्ट कर दूँ? "

उसके सम्मुख यह प्रश्न विचार था 


हाँ उसने ही स्थापित किया था मुझको 

पर मेरी रगों में रक्त तुम्हारा है 


मुझ नवजात को संभाला तुमने 

विदेशी बोली की छोटी, सौतेली 

बहन बना कर पाला तुमने 

सशक्त किया मेरे जीवन को

महादेवी और निराला ने 


हो गयी हूँ अब 75 बरस की 

क्या अब घर से निकालोगे ?

क्या मेरे आभाव में बिना विघ्न के

नव संस्कृति को संभालोगे ? 

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Saturday, 14 September 2019

मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती




PHOTO COURTESY: FLICKR

बचपन
मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती
इसीलिए अभी तक स्वयं में
समेटे हूँ
तुम्हारी आवाज़ , क्रियाकलाप 
किन्तु अब इन भावनाओं को बाहर लाना
मुझे शोभा नहीं देता
जानते हो क्यूँ ?
क्योंकि तुम्हें मैं बहुत पीछे
छोड़ आई हूँ
तुम्हारी पावन धारा को
एक अंजान सागर में मोड़ आई हूँ
वह अंजान सागर और कुछ नहीं
वही है जो वर्तमान है
जो सागर सा विशाल है
फैला चक्षु सम्मुख
किन्तु इसमें तुम्हारा
कोई अंश नहीं
कोई उमंग नहीं
कोई लहर नहीं
किन्तु फिर भी
मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती ।


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क्या तुम

 क्या तुम कभी मेरी  सुबह का हिस्सा बन पाओगे  जल्दी- जल्दी तैयार होते  मेरे अदना सवाल सुन पाओगे  वो चाय की चुस्कियों के बीच की खामोशियाँ  उनम...