PHOTO COURTESY: FLICKR
बचपन
मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती
इसीलिए अभी तक स्वयं में
समेटे हूँ
तुम्हारी आवाज़ , क्रियाकलाप
किन्तु अब इन भावनाओं को बाहर लाना
मुझे शोभा नहीं देता
जानते हो क्यूँ ?
क्योंकि तुम्हें मैं बहुत पीछे
छोड़ आई हूँ
तुम्हारी पावन धारा को
एक अंजान सागर में मोड़ आई हूँ
वह अंजान सागर और कुछ नहीं
वही है जो वर्तमान है
जो सागर सा विशाल है
फैला चक्षु सम्मुख
किन्तु इसमें तुम्हारा
कोई अंश नहीं
कोई उमंग नहीं
कोई लहर नहीं
किन्तु फिर भी
मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती ।
I am taking my blog to the next level with Blogchatter's #MyFriendAlexa.
समेटे हूँ
तुम्हारी आवाज़ , क्रियाकलाप
किन्तु अब इन भावनाओं को बाहर लाना
मुझे शोभा नहीं देता
जानते हो क्यूँ ?
क्योंकि तुम्हें मैं बहुत पीछे
छोड़ आई हूँ
तुम्हारी पावन धारा को
एक अंजान सागर में मोड़ आई हूँ
वह अंजान सागर और कुछ नहीं
वही है जो वर्तमान है
जो सागर सा विशाल है
फैला चक्षु सम्मुख
किन्तु इसमें तुम्हारा
कोई अंश नहीं
कोई उमंग नहीं
कोई लहर नहीं
किन्तु फिर भी
मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती ।
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